"अपने अनुभवों की भली बुरी बहुत सी स्मृतियां कभी कभी उसे याद आ जाती हैं । परंतु वो सब मानो पुस्तक में पढ़ी हुई कल्पित कहानियों की तरह अवास्तविक मालूम होती हैं ।"
Friday, March 31, 2017
अनुराधा - शरतचंद्र
Saturday, March 25, 2017
स्मरण -1
वैसे तो मेरा जन्म मुरादाबाद में हुआ पर मेरे जेहन में वहां की कोई याद नहीं बची है, उसके बाद पिताजी का तबादला उत्तर काशी हो गया, वहां भी मै इतना बड़ा नहीं था की वहां की कुछ यादें संजो पता वहां की सिर्फ तस्वीरे देखी हैं, एक में कोई दो तीन साल का एक बच्चा लाठी लेकर पहाड़ चढ़ता हुआ दिखता है। कुछ और तस्वीरें है, जन्मदिन मानाते हुए। अपने दिमाग पर जोर डालता हूं तो जहाँ से मुझे मेरा बचपन याद आना शुरू होता है वो जगह है, हरदोई। पापा सरकारी नौकरी में थे तो रहने के लिए सरकारी आवास मिला हुआ था, और सरकारी आवासों की एक ख़ास बात होती है कि वो कहीं किसी भी शहर में बने हुए हों अमूमन वो सारे होते एक ही जैसे हैं जो एक बच्चे को अलग अलग जगह की अलग अलग याद बनाने में बहुत मुश्किल पैदा करते हैं, कभी कभी घरो की यादें एक दुसरे में घुलमिल जाती है। हाँ तो मैं बात कर रहा था हरदोई की... तो जो पहली बात मुझे वहां की याद आती है वो है लॉन में लगा हुआ एक नल और उसकी टपकती बूंदों से उसके नीचे बना हुआ एक छोटा सा गड्ढा.... वैसे तो इसमें कोई ख़ास बात नहीं है पर एक बच्चे के लिए उस गड्ढे को जो ख़ास बनता था वो थे उसमें तैरते नन्हे टैडपोल | शैवालों ने उस गड्ढे की तली को मखमली हरी चादर से ढँक दिया था जिनके ऊपर मछलियों सरीखे वो टैडपोल तैरा करते थे | प्रकृति से मुझे बचपन से ही प्रेम रहा है शायद इसीलिए जो यादें मेरे दिलो दिमाग में बसी हुई है वो सबसे ज्यादा प्रकृति से ही सम्बंधित हैं | जब मैं उस घर के मेन गेट से बाहर निकलता हूँ तो बांयी तरफ नहीं जा सकता उधर का मुझे कुछ याद नहीं जब दायीं तरफ जाता हु तो कुछ दूर चलने पर मुझे जामुन के बड़े बड़े पेड़ दीखते हैं, वहा तीन तरह के जामुन के पेड़ थे काली, लाल, और पीली जामुन के पेड़ | हवा से लहराती जामुन के पेड़ों की पीली पीली पत्तियाँ, वो मुझे आज भी साफ़ साफ़ दिखाई देती हैं |
Wednesday, June 5, 2013
Wednesday, May 11, 2011
Monday, March 28, 2011
स्त्रीत्व
" लेकिन पुरुष में थोड़ी पशुता होती है, जिसे वह इरादा कर के भी हटा नहीं सकता| वही पशुता उसे पुरुष बनाती है| विकास के क्रम में वह स्त्री से पीछे है| जिस दिन वह पूर्ण विकास को पहुँचेगा, वह भी स्त्री हो जायेगा| वात्सल्य, स्नेह, कोमलता, दया, इन्ही आधारों पर यह सृष्टि थमी हुई है और यही स्त्रियों के गुण हैं|अगर स्त्री इतना समझ ले, तो फिर दोनों का जीवन सुखी हो जाये| स्त्री पशु के साथ पशु हो जाती है, तभी दोनों दुखी होते हैं|
..... कर्मभूमि - प्रेमचंद
आस्था
दुखी आशा से इश्वर में भक्ति रखता है, सुखी भय से| दुखी पर जितना ही अधिक दुःख पड़े, उसकी भक्ति बढती जाती है| सुखी पर दुःख पड़ता है, तो वह विद्रोह करने लगता है| वह इश्वर को भी अपने धन के आगे झुकाना चाहता है|
..... कर्मभूमि - प्रेमचंद
Thursday, March 3, 2011
चरित्र
कुछ लोग होते हैं
जो इतने कमीने होते हैं
के उनके सामने अगर
उनके ही जैसा एक और आदमी खड़ा कर दिया जाये
तो वो उसे बर्दास्त नहीं कर पाएंगे,
वो खुद अपने आपको बर्दास्त नहीं कर पाएंगे...
.... किसलय
बर्खा
मै सोचता हू...
के इक छत होती
मै होता और तू होती
और साथ में ये बर्खा होती
तू चंचला
तू मनमौजी
बारिस में तू झूमा करती
और पानी कि नन्ही बूंदें
तेरे गलों पर थपकी देतीं |
.... किसलय
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दर्द या दवा
तू दर्द है, या दवा है ? मेरी तक़लीफ़ों की ख़ातिमियत है, या वज़ह है !!
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इंटर करने के १साल बाद जब मैं बी० एस० सी० करने बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी पंहुचा मेरा मन तब भी एक बच्चे का ही था, स्वाभाव से मैं बहोत ही सीध...
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