एक बुरी आदत है मेरी
जब सोचता हूं
तो सोचता ही चला जाता हूं,
विचारों की गलियां
संकरी और गहरी होती चली जाती हैं,
फिर पेड़ की जड़ों के जैसे
मुख्य विचार से कई विचार निकल आते हैं,
सोचता हूं सब लिख दूं
पर हालत मुश्किल हो जाते हैं
एक को पकड़ता हूं तो दूसरे खो जाते हैं,
कुछ तो शब्द बनते हैं
पर बाकी हवा हो जाते हैं।
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