नदी की आगोश में होना,
उसकी ठंडक में मन का शांत होना,
इसे शीतलता कहूंगा ।
पास बैठकर कर बस
उसकी अटखेलियों को,
या उसके शांत बहते जाने को,
देख आनंदित होना
इसे प्रेम कहूंगा।
कभी बस मुझे थोड़ा छू कर दूर चले जाना,
कभी अचानक छींटों से मेरे चेहरे को भिगो देना,
इसे चंचलता कहूंगा।
तुम नदी हो ।
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