इंटर करने के १साल बाद जब मैं बी० एस० सी० करने बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी पंहुचा मेरा मन तब भी एक बच्चे का ही था, स्वाभाव से मैं बहोत ही सीधा था, और इस सिधाई का जो मुझे सबसे बड़ा नुक्सान था वो ये की मैं किसी को किसी भी बात के लिए मना नहीं कर पता था | किसी को घुमने जाना है, मार्किट जाना है, चाय पिने जाना है.... तो मैं कहता था ठीक है चलो, भले ही चाहे मैं उस समय गहरे गहरे अध्यन में डूबा हुआ हूँ, दिमाग के सारे न्यूरॉन alertness की चरम सीमा पर हों, पर अपने दरवाजे पर आये किसी 'घुमक्कड़' दोस्त को मैं मना कैसे कर सकता हूँ कहीं उसे बुरा लग गया तो ? किसी को वो बुक चाहिए जो मुझे कल पढनी है और मुझे पता होता था की कल तक ये मेरी बुक वापस नही करेगा फिर भी मैं दे देता था क्युकी आज वो बुक खाली है और मैं उसे झूंठ नहीं बोल सकता की मैं उसे पढ़ रहा हूँ | किसी को मेरी साइकिल चाहिए और ले जाने के घंटो बाद वो उसे लौटाएगा पता होते हुए भी दे देता था और फिर जब खुद कही जाना होता था तो उसके आने का इंतज़ार करता था | जितना मुझे किसी को ना कहने में संकोच होता था उससे दस गुना मुझे किसी से कुछ मांगने में होता था.... मतलब एक तो करेला ऊपर से नीम चढ़ा | बात थोड़ी मजाकिया जरूर लगती है पर ये पर ये आपको काफी परेशान कर सकती है और आपके अपने लक्ष्य को पाने के रास्ते में रोड़े अटका सकती हैं | तो ना कहना सीखना बहोत ही जरूरी है, ताकि जब जरुरत पड़े तो आप किसी को शालीनता से मना कर सकें | मैंने सीखने की सुरुआत की सबसे पहले अपने दरवाजे के ऊपर "Say No" लिख कर ताकी जब भी कभी दरवाजे पर दस्तक हो, दरवाजा खोलने से पहले ये मुझे याद दिला सके की अगर जरुरत पड़े तो मुझे 'ना' कहना है |
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