" लेकिन पुरुष में थोड़ी पशुता होती है, जिसे वह इरादा कर के भी हटा नहीं सकता| वही पशुता उसे पुरुष बनाती है| विकास के क्रम में वह स्त्री से पीछे है| जिस दिन वह पूर्ण विकास को पहुँचेगा, वह भी स्त्री हो जायेगा| वात्सल्य, स्नेह, कोमलता, दया, इन्ही आधारों पर यह सृष्टि थमी हुई है और यही स्त्रियों के गुण हैं|अगर स्त्री इतना समझ ले, तो फिर दोनों का जीवन सुखी हो जाये| स्त्री पशु के साथ पशु हो जाती है, तभी दोनों दुखी होते हैं|
..... कर्मभूमि - प्रेमचंद
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