Saturday, March 25, 2017

स्मरण -1

वैसे तो मेरा जन्म मुरादाबाद में हुआ पर मेरे जेहन में वहां की कोई याद नहीं बची है, उसके बाद पिताजी का तबादला उत्तर काशी हो गया, वहां भी मै इतना बड़ा नहीं था की वहां की कुछ यादें संजो पता वहां की सिर्फ तस्वीरे देखी हैं, एक में कोई दो तीन साल का एक बच्चा लाठी लेकर पहाड़ चढ़ता हुआ दिखता है। कुछ और तस्वीरें है, जन्मदिन मानाते हुए। अपने दिमाग पर जोर डालता हूं तो जहाँ से मुझे मेरा बचपन याद आना शुरू होता है वो जगह है, हरदोई। पापा सरकारी नौकरी में थे तो रहने के लिए सरकारी आवास मिला हुआ था, और सरकारी आवासों की एक ख़ास बात होती है कि वो कहीं किसी भी शहर में बने हुए हों अमूमन वो सारे होते एक ही जैसे हैं जो एक बच्चे को अलग अलग जगह की अलग अलग याद बनाने में बहुत मुश्किल पैदा करते हैं, कभी कभी घरो की यादें एक दुसरे में घुलमिल जाती है। हाँ तो मैं बात कर रहा था हरदोई की... तो जो पहली बात मुझे वहां की याद आती है वो है लॉन में लगा हुआ एक नल और उसकी टपकती बूंदों से उसके नीचे बना हुआ एक छोटा सा गड्ढा.... वैसे तो इसमें कोई ख़ास बात नहीं है पर एक बच्चे के लिए उस गड्ढे को जो ख़ास बनता था वो थे उसमें तैरते नन्हे टैडपोल | शैवालों ने उस गड्ढे की तली को मखमली हरी चादर से ढँक दिया था जिनके ऊपर मछलियों सरीखे वो टैडपोल तैरा करते थे | प्रकृति से मुझे बचपन से ही प्रेम रहा है शायद इसीलिए जो यादें मेरे दिलो दिमाग में बसी हुई है वो सबसे ज्यादा प्रकृति से ही सम्बंधित हैं | जब मैं उस घर के मेन गेट से बाहर निकलता हूँ तो बांयी तरफ नहीं जा सकता उधर का मुझे कुछ याद नहीं जब दायीं तरफ जाता हु तो कुछ दूर चलने पर मुझे जामुन के बड़े बड़े पेड़ दीखते हैं, वहा तीन तरह के जामुन के पेड़ थे काली, लाल, और पीली जामुन के पेड़ | हवा से लहराती जामुन के पेड़ों की पीली पीली पत्तियाँ, वो मुझे आज भी साफ़ साफ़ दिखाई देती हैं | 

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दर्द या दवा

तू दर्द है, या दवा है ? मेरी तक़लीफ़ों की ख़ातिमियत है, या वज़ह है !!