वो एक पत्ता था ।
पर चोट खाते खाते,
वो पत्थर बन गया ।
अब वो हवा में लहराता नही,
और पानी की बूंदों को महसूस नही कर पता।
फिर भी,
जब कभी बारिश होती है,
उसकी शीतलता उस तक पहुंचती है,
शायद पत्थर में अभी भी पत्ता जिंदा है !
वो फिर से पत्ता बनना चाहता है,
पर वो पत्थर को तोड़कर बाहर नहीं आ पता।
इससे पहले की ये बारिश बंद हो !
और उसे उसके जिंदा होने का एहसास बंद हो जाए ।
वो पेड़ से टूटकर,
बारिश के साथ नदी में बह जाना चाहता है ।
नदी अपनी गोद में लेकर
पत्थर की परतों को धीरे धीरे घिस देगी
और पत्ता आजाद होकर नदी में मिल जायेगा।
बारिश तुम्हारा प्यार है,
और तुम नदी।
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