मै सोचता हू...
के इक छत होती
मै होता और तू होती
और साथ में ये बर्खा होती
तू चंचला
तू मनमौजी
बारिस में तू झूमा करती
और पानी कि नन्ही बूंदें
तेरे गलों पर थपकी देतीं |
.... किसलय
तू दर्द है, या दवा है ? मेरी तक़लीफ़ों की ख़ातिमियत है, या वज़ह है !!
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