दुखी आशा से इश्वर में भक्ति रखता है, सुखी भय से| दुखी पर जितना ही अधिक दुःख पड़े, उसकी भक्ति बढती जाती है| सुखी पर दुःख पड़ता है, तो वह विद्रोह करने लगता है| वह इश्वर को भी अपने धन के आगे झुकाना चाहता है|
..... कर्मभूमि - प्रेमचंद
तू दर्द है, या दवा है ? मेरी तक़लीफ़ों की ख़ातिमियत है, या वज़ह है !!
No comments:
Post a Comment