Friday, May 13, 2022

कोपल

वो एक पत्ता था ।
पर चोट खाते खाते,
वो पत्थर बन गया ।
अब वो हवा में लहराता नही,
और पानी की बूंदों को महसूस नही कर पता।

फिर भी,
जब कभी बारिश होती है,
उसकी शीतलता उस तक पहुंचती है,
शायद पत्थर में अभी भी पत्ता जिंदा है !
वो फिर से पत्ता बनना चाहता है,
पर वो पत्थर को तोड़कर बाहर नहीं आ पता।

इससे पहले की ये बारिश बंद हो !
और उसे उसके जिंदा होने का एहसास बंद हो जाए ।
वो पेड़ से टूटकर,
बारिश के साथ नदी में बह जाना चाहता है ।
नदी अपनी गोद में लेकर
पत्थर की परतों को धीरे धीरे घिस देगी
और पत्ता आजाद होकर नदी में मिल जायेगा।

बारिश तुम्हारा प्यार है,
और तुम नदी।

पहाड़

वो कुछ नहीं कहते 
पर तुम्हे शब्दों से भर देते हैं
और वो भी कम पड़ते हैं 
तुम्हारे लिए
जिनसे की तुम बता सको
की वो क्या क्या कहते हैं
बिना कुछ कहे।

वो विराट हैं
अनंत हैं
असीमित हैं
जब तुम उनकी गोद में होते हो
तुम्हारा घमंड, अहंकार, आकार
सुक्ष्म हो जाता है ।
तुम्हारा अस्तित्व खो जाता है।

वो मौका देते हैं
तुम्हे फिर से जन्म लेने का
खुद को फिर से बनाने का
विनम्र होने का।

वो दूधिया सफेद से
शांति का प्रतीक हैं,
तो वज्र सा सीना लिए 
फौलाद से कठोर भी।

कभी इंद्रधनुषी रंग में
या स्वर्ण सी चमकार है
तो लालिमा लिए हुए
रक्त से सने से भी।

पुष्प की घाटी समेटे
है कहीं गोदी में वो
और जल जटाओं की तरह
धारण किए दिखता है वो।
तो भूल से भी तुम उसे 
भोला समझ लेना नही।
जीवन दिखाता है तुम्हे
तो मौत भी न भूलने दे
काल सी काली छवि
जब राह में तुमसे मिले।

ये पहाड़ हैं।

मैं  इसलिए व्याकुल नहीं दिखता 

कि मृत्यु के दिन से डरता हूँ, 

पर इसलिए दिखता हूँ,

क्यूंकी व्यस्त हूँ,

' जीवन ' को उस दिन के लिए तैयार करने मे |

अपनी एक 'कमी' 

जिसकी कोई इंसान

सबसे ज्यादा कीमत चुकता है,  

वो,

उसका ' समझदार ' होना है |

 ' खोने ' का दुख

हमेशा 

' पाने ' के सुख से 

ज्यादा गहरा 

और लंबा होता है |


- डा0 किसलय 


Wednesday, June 3, 2020

Inspired thought

परमात्मा ने दो धर्म बनाए जिनमें एक लिखित है। यह लिखित धर्म उसमे आस्था रखने वाले लोगों के पथ प्रदर्शन के लिए है, जो उसके उपदेशों का पालन करके उनके चित्रित किए स्वर्ग में जाएंगे दूसरा धर्म हमारे हाथों में है हमारा यह धर्म आकाश, चट्टानों, नदियों और पर्वतों में है। और हम लोग जो उसे प्राकृति में देखते हैं उसकी वाणी को सुनते हैं और अंततः उसे स्वर्ग के उस पार जाकर खोज लेते हैं।

Sunday, May 24, 2020

डॉ. भीमराव अम्बेडकर - सम्पूर्ण वाङ्मय - खंड 10

यह निर्विवाद है कि धार्मिक मान्यता से अधिक शक्तिशाली कोई और मान्यता नहीं हो सकती, जिसे कोई संस्था या आस्था अपने अस्तित्व को बनाए रखने और उसे पुष्ट करने के लिए अर्जित कर सकती है। उसकी शक्ति अनंत है और उसका शिकंजा फौलादी है। लेकिन यह बात कम ही समझ में आती है कि इस धार्मिक मान्यता को इतनी बढ़िया किस्म की अश्व-शक्ति कैसे और कहां से प्राप्त होती है?

Thursday, May 14, 2020

दर्द या दवा

तू दर्द है,
या दवा है ?
मेरी तक़लीफ़ों की ख़ातिमियत है,
या वज़ह है !!

Wednesday, May 13, 2020

डॉ. भीमराव अम्बेडकर - सम्पूर्ण वाङ्मय - खंड 10

जो कुछ मैं कर पाया हूं, वह जीवन-भर मुसीबत सहन करके विरोधियों से टक्कर लेने के बाद ही कर पाया हूं। जिस कारवां को आप यहां देख रहे हैं, उसे मैं अनेक कठिनाइयों से यहां ले आ पाया हूं। अनेक अवरोध, जो इसके मार्ग में आ सकते है, के बावजूद इस कारवां को बढ़ते रहना है। अगर मेरे अनुयायी इसे आगे ले जाने में असमर्थ रहे तो उन्हें इसे यहीं पर छोड़ देना चाहिए, जहां पर यह अब है। पर किन्हीं भी परिस्थितियों में इसे पीछे नही हटने देना है। मेरी जनता के लिए मेरा यह संदेश है।

- भीमराव अम्बेडकर

डॉ. भीमराव अम्बेडकर - सम्पूर्ण वाङ्मय - खंड 9

जिस समाज में कुछ वर्गों के लोग जो कुछ चाहें वह सब कुछ कर सकें और बाकी वह सब भी न कर सके जो उन्हें करना चाहिए, उस समाज के अपने गुण होते होंगे, लेकिन इनमें स्वतंत्रता शामिल नहीं होगी। अगर इंसानों के अनुरूप जीने की सुविधा कुछ लोगों तक ही सीमित है, तब जिस सुविधा को आमतौर पर स्वतंत्रता कहा जाता है, उसे विशेषाधिकार कहना अधिक उचित होगा।

-भीमराव अम्बेडकर

दर्द या दवा

तू दर्द है, या दवा है ? मेरी तक़लीफ़ों की ख़ातिमियत है, या वज़ह है !!