Friday, May 13, 2022

सच्चाई का आइना

हम खुद को वैसा दिखते हैं
जैसा खुद को देखना हमें अच्छा लगता है, 
और लोगों को हम वैसा दिखते हैं,
जैसा वो हमारे बारे में सोचते हैं, 
तो वो आइना कहां है,
जिसमे हम अपना सच देख सकें?

लेखन

लिखने के लिए एकांत चाहिए, क्युकी एकांत जितना गहराता जाता है कल्पनाशीलता का फैलाव उतना ही बढ़ता जाता है, और हमेशा आप अपने बारे में ही नहीं लिख सकते, वह बोरिंग हो सकता है। अलग लिखने के लिए आप को कोई और होना पड़ेगा पर यदि आप पर लोगो की नजरें हैं तो वो आप को कोई और होने नही देंगी। आप कोई और होने की कोशिश करोगे पर वो आपको यथार्थ में खींच लाएंगी।

यादें

जितना हम अपनें वर्तमान को जीते हैं उससे ज्यादा हम अपनी यादों को जीते हैं। तो रुकिए और पूछिए अपने आप से क्या जो वर्तमान आप जी रहे हैं वो आपकी यादों में जगह बनाने लायक है या नही? सोचिए वो नजदीकी याद जो आपको खुशी देती है, कितने साल पुरानी है... ये कड़वा सच है, की ये वो वक्त है, जो आपने जिया ही नहीं।

बुरी आदत

एक बुरी आदत है मेरी
जब सोचता हूं 
तो सोचता ही चला जाता हूं,
विचारों की गलियां 
संकरी और गहरी होती चली जाती हैं,
फिर पेड़ की जड़ों के जैसे 
मुख्य विचार से कई विचार निकल आते हैं,
सोचता हूं सब लिख दूं
पर हालत मुश्किल हो जाते हैं
एक को पकड़ता हूं तो दूसरे खो जाते हैं,
कुछ तो शब्द बनते हैं
पर बाकी हवा हो जाते हैं।

तुम नदी हो

नदी की आगोश में होना,
उसकी ठंडक में मन का शांत होना,
इसे शीतलता कहूंगा ।

पास बैठकर कर बस 
उसकी अटखेलियों को,
या उसके शांत बहते जाने को,
देख आनंदित होना
इसे प्रेम कहूंगा।

कभी बस मुझे थोड़ा छू कर दूर चले जाना,
कभी अचानक छींटों से मेरे चेहरे को भिगो देना,
इसे चंचलता कहूंगा।

तुम नदी हो ।

कोपल

वो एक पत्ता था ।
पर चोट खाते खाते,
वो पत्थर बन गया ।
अब वो हवा में लहराता नही,
और पानी की बूंदों को महसूस नही कर पता।

फिर भी,
जब कभी बारिश होती है,
उसकी शीतलता उस तक पहुंचती है,
शायद पत्थर में अभी भी पत्ता जिंदा है !
वो फिर से पत्ता बनना चाहता है,
पर वो पत्थर को तोड़कर बाहर नहीं आ पता।

इससे पहले की ये बारिश बंद हो !
और उसे उसके जिंदा होने का एहसास बंद हो जाए ।
वो पेड़ से टूटकर,
बारिश के साथ नदी में बह जाना चाहता है ।
नदी अपनी गोद में लेकर
पत्थर की परतों को धीरे धीरे घिस देगी
और पत्ता आजाद होकर नदी में मिल जायेगा।

बारिश तुम्हारा प्यार है,
और तुम नदी।

पहाड़

वो कुछ नहीं कहते 
पर तुम्हे शब्दों से भर देते हैं
और वो भी कम पड़ते हैं 
तुम्हारे लिए
जिनसे की तुम बता सको
की वो क्या क्या कहते हैं
बिना कुछ कहे।

वो विराट हैं
अनंत हैं
असीमित हैं
जब तुम उनकी गोद में होते हो
तुम्हारा घमंड, अहंकार, आकार
सुक्ष्म हो जाता है ।
तुम्हारा अस्तित्व खो जाता है।

वो मौका देते हैं
तुम्हे फिर से जन्म लेने का
खुद को फिर से बनाने का
विनम्र होने का।

वो दूधिया सफेद से
शांति का प्रतीक हैं,
तो वज्र सा सीना लिए 
फौलाद से कठोर भी।

कभी इंद्रधनुषी रंग में
या स्वर्ण सी चमकार है
तो लालिमा लिए हुए
रक्त से सने से भी।

पुष्प की घाटी समेटे
है कहीं गोदी में वो
और जल जटाओं की तरह
धारण किए दिखता है वो।
तो भूल से भी तुम उसे 
भोला समझ लेना नही।
जीवन दिखाता है तुम्हे
तो मौत भी न भूलने दे
काल सी काली छवि
जब राह में तुमसे मिले।

ये पहाड़ हैं।

मैं  इसलिए व्याकुल नहीं दिखता 

कि मृत्यु के दिन से डरता हूँ, 

पर इसलिए दिखता हूँ,

क्यूंकी व्यस्त हूँ,

' जीवन ' को उस दिन के लिए तैयार करने मे |

अपनी एक 'कमी' 

जिसकी कोई इंसान

सबसे ज्यादा कीमत चुकता है,  

वो,

उसका ' समझदार ' होना है |

 ' खोने ' का दुख

हमेशा 

' पाने ' के सुख से 

ज्यादा गहरा 

और लंबा होता है |


- डा0 किसलय 


दर्द या दवा

तू दर्द है, या दवा है ? मेरी तक़लीफ़ों की ख़ातिमियत है, या वज़ह है !!