हमरे पूर्वज हमसे कहीं जादा बुद्धिमान थे,
उन्होने जीने का एक तरीका बनाया,
जीने का एक सही ढंग,
उसे कहा " धर्म "
और लोगो से कहा वो इसके अनुसार चलें
तो उनका जीवन बेहतर हो सकेगा,
फिर समय बदलता गया...
चीजें बदलती गईं
लोगो का मिजाज बदलता गयानहीं बदला तो "धर्म", वो तरीका,
वो उन्ही तरीकों से जीने कि कोशिश कर रहे हैं....
हर जगह पानी ही पानी था
लोग उसमे तैरते रहते थे, हाँथ पांव मरते रहते,
थके हारे...
फिर उनमे से कुछ बुद्धजीवियों ने सोचा...
उन्होने एक नाव बनायी,
और लोगो को उसमे बिठा दिया,
लोगो को बहोत अच्छा लगा
अब वो आराम से चप्पू चलते और नाव में तैर करते थे...
अब पानी बहुत कुछ सूख चूका है
वहां कीचड़ है,
लेकिन लोग..
नव में बैठे हुए हैं
चप्पू चला रहे हैं
उस कीचड़ में..
कुछ दिनों में ये कीचड़ भी सूख जायेगा,
नाव इंच भर भी न हिलेगी
मै समझता हूँ
तब लोग इसे उठा कर सर पर रख लेंगे
और घुटनों क बल उस सख्त जमीं पर
तैरने कि कोशिश करेंगे....
..... डा. किसलय
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