Wednesday, June 3, 2020

Inspired thought

परमात्मा ने दो धर्म बनाए जिनमें एक लिखित है। यह लिखित धर्म उसमे आस्था रखने वाले लोगों के पथ प्रदर्शन के लिए है, जो उसके उपदेशों का पालन करके उनके चित्रित किए स्वर्ग में जाएंगे दूसरा धर्म हमारे हाथों में है हमारा यह धर्म आकाश, चट्टानों, नदियों और पर्वतों में है। और हम लोग जो उसे प्राकृति में देखते हैं उसकी वाणी को सुनते हैं और अंततः उसे स्वर्ग के उस पार जाकर खोज लेते हैं।

Sunday, May 24, 2020

डॉ. भीमराव अम्बेडकर - सम्पूर्ण वाङ्मय - खंड 10

यह निर्विवाद है कि धार्मिक मान्यता से अधिक शक्तिशाली कोई और मान्यता नहीं हो सकती, जिसे कोई संस्था या आस्था अपने अस्तित्व को बनाए रखने और उसे पुष्ट करने के लिए अर्जित कर सकती है। उसकी शक्ति अनंत है और उसका शिकंजा फौलादी है। लेकिन यह बात कम ही समझ में आती है कि इस धार्मिक मान्यता को इतनी बढ़िया किस्म की अश्व-शक्ति कैसे और कहां से प्राप्त होती है?

Thursday, May 14, 2020

दर्द या दवा

तू दर्द है,
या दवा है ?
मेरी तक़लीफ़ों की ख़ातिमियत है,
या वज़ह है !!

Wednesday, May 13, 2020

डॉ. भीमराव अम्बेडकर - सम्पूर्ण वाङ्मय - खंड 10

जो कुछ मैं कर पाया हूं, वह जीवन-भर मुसीबत सहन करके विरोधियों से टक्कर लेने के बाद ही कर पाया हूं। जिस कारवां को आप यहां देख रहे हैं, उसे मैं अनेक कठिनाइयों से यहां ले आ पाया हूं। अनेक अवरोध, जो इसके मार्ग में आ सकते है, के बावजूद इस कारवां को बढ़ते रहना है। अगर मेरे अनुयायी इसे आगे ले जाने में असमर्थ रहे तो उन्हें इसे यहीं पर छोड़ देना चाहिए, जहां पर यह अब है। पर किन्हीं भी परिस्थितियों में इसे पीछे नही हटने देना है। मेरी जनता के लिए मेरा यह संदेश है।

- भीमराव अम्बेडकर

डॉ. भीमराव अम्बेडकर - सम्पूर्ण वाङ्मय - खंड 9

जिस समाज में कुछ वर्गों के लोग जो कुछ चाहें वह सब कुछ कर सकें और बाकी वह सब भी न कर सके जो उन्हें करना चाहिए, उस समाज के अपने गुण होते होंगे, लेकिन इनमें स्वतंत्रता शामिल नहीं होगी। अगर इंसानों के अनुरूप जीने की सुविधा कुछ लोगों तक ही सीमित है, तब जिस सुविधा को आमतौर पर स्वतंत्रता कहा जाता है, उसे विशेषाधिकार कहना अधिक उचित होगा।

-भीमराव अम्बेडकर

डॉ. भीमराव अम्बेडकर - सम्पूर्ण वाङ्मय - खंड 6

कार्य करने की वास्तविक स्वतंत्रता केवल वहीं पर होती है, जहां शोषण का समूल नाश कर दिया गया है, जहां एक वर्ग द्वारा दूसरे वर्ग पर अत्याचार नहीं किया जाता, जहां बेरोजगारी नहीं है, जहां गरीबी नहीं है, जहां किसी व्यक्ति को अपने धंधे के हाथ से निकल जाने का भय नहीं है, अपने कार्यों के परिणामस्वरूप जहां व्यक्ति अपने धंधे की हानि, घर की हानि तथा रोजी-रोटी की हानि के भय से मुक्त है ।

- भीमराव अम्बेडकर

डॉ. भीमराव अम्बेडकर - सम्पूर्ण वाङ्मय - खंड 5

राष्ट्रवाद तभी औचित्य ग्रहण कर सकता है जब लोगों के बीच जाति, नस्ल या रंग का अंतर भुलाकर उनमें सामाजिक-भ्रातृत्व को सर्वोच्च स्थान दिया जाए।

- भीमराव अम्बेडकर

डॉ. भीमराव अम्बेडकर - सम्पूर्ण वाङ्मय - खंड 4

यदि व्यक्ति का प्रेम तथा घृणा प्रबल नहीं है तो वह यह आशा नहीं कर सकता कि वह अपने युग पर कोई प्रभाव छोड़ सकेगा और ऐसी सहायता प्रदान कर सकेगा, जो महान सिद्धांतों तथा संघर्ष की अपेक्षा लक्ष्यों के लिए उचित हो। मैं अन्याय, अत्याचार, आडंबर तथा अनर्थ से घृणा करता हूं और मेरी घृणा उन सब लोगों के प्रति है, जो इन्हें अपनाते हैं। वे दोषी है। मैं अपने आलोचकों को यह बताना चाहता हूं कि मैं अपने इन भावों को वास्तविक बल व शक्ति मानता हूं। वे केवल उस प्रेम की अभिव्यक्ति है, जो मैं उन लक्ष्यों व उद्देश्यों के लिए प्रकट करता हूं, जिनके प्रति मेरा विश्वास है।

- भीमराव अम्बेडकर

Thursday, April 30, 2020

Eleven Days Across Hills - Day 2 & 3

खटीमा - पिथौरागढ़ - खटीमा {06 & 07.07.2010} . . . . .

खटीमा से पिथौरागढ़ की यात्रा में रोमांच थोड़ा कम है पर खूबसूरत नज़ारे बहुत हैं, असल में हुआ यूँ की खटीमा में सुहैल के मित्र के घर वालो को जब ये पता चला की ये सारी यात्रा हम लोग बाइक पर करने निकले हैं तो वे काफी डर गए और हमें भी खूब डराया की बाइक से जाना सुरक्षित नहीं है, सड़क ख़राब होती है, लड़  जाओगे, पहाड़ से गिर जाओगे, जाने क्या क्या .....  अब घर के बड़े बुजुर्गो ने राय दी और हमें भी  बाइक से पहाड़ो की यात्रा का कोई पूर्व अनुभव नहीं था, तो मैंने  और सुहैल ने तय किया की पिथौरागढ़ हम लोग बस से जायेंगे और ये देखेंगे कि पहाड़ी सड़कें कैसी होती है और क्या हम उनपर  बाइक चला पाएंगे | 
पिथौरागढ़ के लिए बस टनकपुर से मिलती है (सैनिक आरामगढ़ बस स्टेशन) हम एक जीप में बैठ कर बस स्टेशन पहुचे, बस पकड़ी और चल दिए पिथौरागढ़ क रास्ते पर | 


रास्ता शुरु से ही खूबसूरत है नदियों और जंगलो को पार कर हम पहाड़ी रास्ते पर पहुच गए और उन रास्तो पर पहुचते ही हम दोनों को अफ़सोस होना शुरू हो गया, क्युकी जो जानकारी हमें दि गई थी वो बिलकुल गलत थी | वहा की सड़के इतनी अच्छी स्थिति में थी जो की अक्सर हमें प्लेन एरिया में भी देखने को नहीं मिलती और लोग उस पर बाइक क्या स्कूटर से भी चल रहे थे | अब  हमें अफ़सोस होने लगा की इतनी अच्छी सड़क पर बाइक राइडिंग मिस कर दी |  इस बस यात्रा में एक बार सुहैल को हल्का बुखार हुआ और एक बार मुझे, शायद मौसम में परिवर्तन की वजह से पर कोई परेशानी नहीं हुई क्युकी हमारे पास दवायें और कम्बल था |




ऊपर तस्वीरो में आप अच्छी सड़क और स्कूटर देख सकते हैं |
पितौरागढ़ पहुचते पहुचते अँधेरा हो चला था तो हमने एक होटल लिया और फ्रेश हो कर खाने की तलाश में निकले, हमारा बजट कम था तो कोशिश यही होती थी की बजट में ही कही अच्छा खाना मिल जाए और पास ही हमें एक रेस्टोरेंट मिला जहा हमने दाल फ्राई और रोटी खाई और वो मेरी तब तक की खाई सबसे बढ़िया दाल फ्राई, थी उसमे डाले घी की खुशबू बिलकुल फ्रेश और देसी थी, वाह ! पहाड़ों और गाँवों की ये खासियत है की आपको वहा शुद्ध खाने को मिलता है बशर्ते वो आज की अधाधुंध फैलती आधुनिकता, भीड़ और प्रदुषण से थोड़े दूर हों .

सुबह हमें पिथौरागढ़ की असल ख़ूबसूरती दिखाई दी, पूरा शहर एक घटी में बसा है जिसके चारो तरफ ऊँचे पहाड़ हैं हम ऐसे ही एक पहाड़ पर बने होटल में रुके हुए थे जहा से नज़ारा और भी सुन्दर दिख रहा था |


१- पिथौरागढ़ शहर का नज़ारा
२- दुर्गा होटल जहाँ हमने खाना खाया
३- सम्राट होटल जहाँ हम रुके थे 
शेष -टैक्सी स्टैंड, रस्ते में मिला एक घंटी वाला मंदिर, नज़ारे और वापसी में खटीमा जाते उए एक ऑटो में |

इस सफ़र में बाइक राइड का रोमांच तो हमने मिस कर दिया पर हमें एक्स्पीरिएंस और कॉन्फिडेंस मिला की हम पहाड़ो पर भी बाइक राइड कर सकते हैं | हम वापस खटीमा में अपने होटल में आ गए और आगे के सफ़र की प्लानिंग करने लगे जिसका पहला डेस्टिनेशन था बिजनौर, हमने काशीपुर से गुजरने वाला रास्ता तय किया जिससे बिजनौर करीब 223 km पड़ता है  और ये रास्ता पहाड़ो से सटकर चलता है तो हमने सोचा की इस रास्ते पर खुबसूरत नज़ारे भी देखने को मिलेंगे |

आगे चौथे दिन की कहानी अगली पोस्ट में, क्युकी यात्रा अभी जारी है . . . . 

दर्द या दवा

तू दर्द है, या दवा है ? मेरी तक़लीफ़ों की ख़ातिमियत है, या वज़ह है !!