Thursday, November 2, 2017

जीवन काल

विधाता ने मनुष्य की आयु 100 वर्ष तय की है , जिसमे से आधी रात्रि में चली जाती है, बची आधी में से आधी भी बाल्यावस्था और वृद्धावस्था में गुज़र जाती है और बाकी बचे 25 वर्षों में मनुष्य को रोग और वियोग के अनेक दुख झेलने पड़ते हैं और नौकरी चाकरी करनी पड़ती है। इसलिए हम कह सकते हैं कि जलतरंग के समान चंचल इस जीवन में लेश मात्र सुख भी नही है।
...भतृहरि

Friday, April 28, 2017

Eleven Days Across Hills - Day 1

लखनऊ से खटीमा तक का सफ़र [०५.०७.२०१०] . . . . 

५ जुलाई, २०१०... इस दिन शुरु की थी हमने अपनी ११ दिन लम्बी बाइक की यात्रा | दो साल पहले ही अपना प्रोफेशनल स्नातक पाठ्यक्रम पूरा कर लिया था और परास्नातक प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर रहा था | इस साल के एग्जाम बस अभी ख़त्म हुए थे | पूरे साल की तैयारी के बाद एग्जाम ख़त्म होने की ख़ुशी तो सभी जानते हैं.. पर मेरा दिमाग थोडा जादा ही ओवरलोड हो गया था और मैं पूरी तेरह से तरोताजा होना चाहता था | तो कही घूमने का प्लान मन में बनाने लगा, कही जाने के लिए कम से कम एक साथी की जरूरत तो थी ही, तो मन में एक दोस्त का ख़याल आया जिसकी खासियत ये थी की वो बाइक बहोत अच्छी चलाता था, उसका नाम था सुहैल | बाइक पर २७० किमी० की दूरी तय करने का एक्सपीरियंस तो मेरे पास भी था... एक दोस्त की शादी में लखनऊ से गोरखपुर गया था बाइक से | सुहैल से जब मैंने इस बारे में बात की तो वो तुरंत मान गया | वो बाइक चलाने में अच्छा था और मैं प्लान करने में, तो वो हमारी दो लोगो की टीम का पायलट बना और मैं नेविगेटर | 
हमारे पास समय बहुत कम था तो मैंने प्लान पर काम करना शुरू कर दिया | प्लानिंग करने में टेक्नोलॉजी ने मेरी बहुत मदद की, उस समय मेरे पास नोकिया ५८०० था और थे - सर्वज्ञानी गूगल बाबा | कुछ और चीजों की भी हमें जरूरत थी जैसे, एक बैग, दस्ताने, गॉगल्स, हेलमेट, एक बाइक और सबसे जरूरी चीज, कुछ पैसे | फण्ड की हमारे पास कमी थी ही, तो प्लान किया गया की अपने रूट को इस तरह से प्लान किया जाए जो हमारे दोस्तों और जाने वालो की घर से गुजरे ताकि एक तो कुछ पुराने लोगों से मुलाक़ात हो जाए और दूसरा ये की हमारे कही बहार रुकने का खर्चा बच सके | सुहैल का एक दोस्त खटीमा में रहता था और हमारे एक सीनियर बिजनोर में रहते थे | तो इनके आस पास की घुमने वाली जगहों को ध्यान में रखकर मैंने एक प्लान बना लिया |


ये गुजरता था लखनऊ से सीतापुर, खटीमा, पिथोरागढ़, वापस खटीमा, बिजनौर, हरिद्वार, ऋषिकेश, देहरादून, मसूरी फिर वहा से वापस बिजनौर फिर नैनीताल, और वहा से सीधे लखनऊ | नैनीताल के पास ही जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क है तो प्लान था की अगर समय मिला तो वहा भी होते चलेंगे | कुल मिला कर करीब १२-१५०० किमी० का प्लान था |

तो बस अब सब कुछ तैयार था तो ५ जुलाई को भोर में ४ बजे निकलने का समय तय हो गया | मैं ३ तारीख की रात को सरदार पटेल हॉस्टल, सुहैल के पास चला गया ताकि सुबह-सुबह समय पर निकला जा सके | उत्सुकता में रात में नीद तो आ नहीं आ रही थी पर मैं और सुहैल अपने "ड्रीम टूर" की बाते करते करते कब सो गए पता ही नहीं चला |
सुबह ४ बजे का आलार्म बजा तो हमारी नीद खुली .......सारा सामान तो पहले से ही पैक रखा था, हम बस नहाये धोये और चल दिए अपनी अपाचे बाइक लेकर | पहले हमने कॉलेज के अन्दर चाय पी, बाइक का ओडोमीटर शून्य पर किया ताकी हमें पता चल सके की पूरी यात्रा में हमने कितने किलोमीटर का सफ़र तय किया | फिर हम कालेज के पिछले गेट से खदरा होते हुए सीतापुर की ओर चल दिए, बाइक सोहेल चल रहा था और मई करीब १० किलो का बैग लेकर पीछे बैठा हुआ था |


जुलाई का महिना था और जब हम निकले तो बाहर बिलकुल अँधेरा था, पहला स्टॉप हमने सीतापुर पहुच कर ही लिया जो लखनऊ से करीब ८० किमि० दूर है|
जहाँ हम रुके वो एक ढाबे-नुमा चाय की दूकान थी या शायद चाय की दूकान-नुमा ढाबा था, पता नहीं, वहा काम करने वाले सुबह सुबह खाना बनाने का समान तैयार करने में लगे थे |


बाइक से उतरकर हमने अपनी कमर सीधी की और भोर की ठंडी हवा में एक लम्बी सांस ली, शहर से दूर प्रदूषण-रहित हवा में एक अलग ही खुशबू होती है| हमने एक एक कप चाय पी और फिर आगे निकल लिए | अभी तो हमने आधी दूरी भी तय नहीं की थी, लखनऊ से खटीमा की दूरी करीब २७० किमि० है | खैर हम चलते रहे रास्ते में कही-कही रुक कर चाय पी कुछ खाया पिया, नज़ारे देखे, एक चर्च में घूमे ...... और खटीमा की ओर चलते रहे ....अनजान जगहों पर अनजान लोगो से पता पूछते हुए... पर इसी बीच एक परेशानी आ खडी हुई... हमारी बाइक का स्टैंड टूट गया... बिना स्टैंड के चलने में तो कोई परेशानी नहीं थी पर जब भी बाइक खड़ी करनी होती बहोत परेशानी हो जाती थी.. अब वहाँ के लोकल मैकेनिक्स तो इसे ठीक नहीं कर पाते तो हमने TVS बाइक का एक शोरूम खोजा और जा कर अपनी बाइक ठीक करवाई... और फिर निकल पड़े खटीमा की ओर......




अंततः शाम को हम खटीमा पहुच गए.

सुहैल के दोस्त ने पहले ही हमारे लिए होटल देख रखा था | हमने होटल पहुच कर अपना सामान वहा रख दिया, अँधेरा होने में अभी थोडा समय था तो सोचा की थोडा खटीमा भी घूम लिया जाए| खटीमा उतराखंड में नेपाल की सीमा के पास शारदा नदी के किनारे बसा एक छोटा सा टाउन है| शहर में तो कुछ घूमने को था नहीं तो सोचा शारदा नदी पर ही घूम लिया जाए| रास्ते में पहले हम सागौन के बड़े बड़े पेड़ों के एक जंगल से गुज़रे, ये रास्ता टनकपुर को जाता था जहाँ पर खटीमा का पॉवर स्टेशन भी है | जंगलों के बाद हम एक थोड़ी खुली जगह पर पहुचे जहा से दूर पहाड़ों की एक श्रृंखला दिखाई दे रही थी | अदभुद ! दूर से दिख रहे उन पहाड़ों ने इस यात्रा को लेकर हमारे रोमांच को और भी बढ़ा दिया, आखिर उन पहाड़ों पर ही तो हमें जाना था | कुछ देर उस नज़ारे का आनंद उठाने के बाद हम आगे बढ़े और टनकपुर के पॉवर स्टेशन को देखते हुए शारदा नदी के किनारे पहुच गए | नदी का वो किनारा जहाँ पर हम थे बिलकुल नेपाल की सीमा से लगा हुआ है | नदी का वो नज़ारा बहुत ही खूबसूरत था, कुछ बच्चे वहा नदी में नहा रहे थे, वही नदी पर एक डैम भी बना हुआ है | सूरज डूबने वाला था तो हम कुछ तस्वीरे लेते हुए वापस हो लिए |


सागौन के पेड़ों का जंगल

दूर दिखाई पड़ते पर्वत

टनकपुर इलेक्ट्रिक पॉवर प्लांट
सुहैल अपने मित्र के साथ



नदी में नहाते लोग
    

सूर्यास्त का सुन्दर नज़ारा

वापसी के समय

यात्रा अभी जारी है....अगले लेख में आगे का वृतांत |

Wednesday, April 5, 2017

"ना' कहना सीखिये

 इंटर करने के १साल बाद जब मैं बी० एस० सी० करने बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी पंहुचा मेरा मन तब भी एक बच्चे का ही था, स्वाभाव से मैं बहोत ही सीधा था, और इस सिधाई का जो मुझे सबसे बड़ा नुक्सान था वो ये की मैं किसी को किसी भी बात के लिए मना नहीं कर पता था | किसी को घुमने जाना है, मार्किट जाना है, चाय पिने जाना है.... तो मैं कहता था ठीक है चलो, भले ही चाहे मैं उस समय गहरे गहरे अध्यन में डूबा हुआ हूँ, दिमाग के सारे न्यूरॉन alertness की चरम सीमा पर हों, पर अपने दरवाजे पर आये किसी 'घुमक्कड़' दोस्त को मैं मना कैसे कर सकता हूँ कहीं उसे बुरा लग गया तो ?  किसी को वो बुक चाहिए जो मुझे कल पढनी है और मुझे पता होता था की कल तक  ये मेरी बुक वापस नही करेगा फिर भी मैं दे देता था क्युकी आज वो बुक खाली है और मैं उसे झूंठ नहीं बोल सकता की मैं उसे पढ़ रहा हूँ | किसी को मेरी साइकिल चाहिए और ले जाने के घंटो बाद वो उसे लौटाएगा पता होते हुए भी दे देता था और फिर जब खुद कही जाना होता था तो उसके आने का इंतज़ार करता था | जितना मुझे किसी को ना कहने में संकोच होता था उससे दस गुना मुझे किसी से कुछ मांगने में होता था.... मतलब एक तो करेला ऊपर से नीम चढ़ा | बात थोड़ी मजाकिया जरूर लगती है पर ये पर ये आपको काफी परेशान कर सकती है और आपके अपने लक्ष्य को पाने के रास्ते में रोड़े अटका सकती  हैं | तो ना कहना सीखना बहोत ही जरूरी है, ताकि जब जरुरत पड़े तो आप किसी को शालीनता से मना कर सकें | मैंने सीखने की सुरुआत की सबसे पहले अपने दरवाजे के ऊपर "Say No" लिख कर ताकी जब भी कभी दरवाजे पर दस्तक हो, दरवाजा खोलने से पहले ये मुझे याद दिला सके की अगर जरुरत पड़े तो मुझे 'ना' कहना है |

Friday, March 31, 2017

अनुराधा - शरतचंद्र

"अपने अनुभवों की भली बुरी बहुत सी स्मृतियां कभी कभी उसे याद आ जाती हैं । परंतु वो सब मानो पुस्तक में पढ़ी हुई कल्पित कहानियों की तरह अवास्तविक मालूम होती हैं ।"

Saturday, March 25, 2017

स्मरण -1

वैसे तो मेरा जन्म मुरादाबाद में हुआ पर मेरे जेहन में वहां की कोई याद नहीं बची है, उसके बाद पिताजी का तबादला उत्तर काशी हो गया, वहां भी मै इतना बड़ा नहीं था की वहां की कुछ यादें संजो पता वहां की सिर्फ तस्वीरे देखी हैं, एक में कोई दो तीन साल का एक बच्चा लाठी लेकर पहाड़ चढ़ता हुआ दिखता है। कुछ और तस्वीरें है, जन्मदिन मानाते हुए। अपने दिमाग पर जोर डालता हूं तो जहाँ से मुझे मेरा बचपन याद आना शुरू होता है वो जगह है, हरदोई। पापा सरकारी नौकरी में थे तो रहने के लिए सरकारी आवास मिला हुआ था, और सरकारी आवासों की एक ख़ास बात होती है कि वो कहीं किसी भी शहर में बने हुए हों अमूमन वो सारे होते एक ही जैसे हैं जो एक बच्चे को अलग अलग जगह की अलग अलग याद बनाने में बहुत मुश्किल पैदा करते हैं, कभी कभी घरो की यादें एक दुसरे में घुलमिल जाती है। हाँ तो मैं बात कर रहा था हरदोई की... तो जो पहली बात मुझे वहां की याद आती है वो है लॉन में लगा हुआ एक नल और उसकी टपकती बूंदों से उसके नीचे बना हुआ एक छोटा सा गड्ढा.... वैसे तो इसमें कोई ख़ास बात नहीं है पर एक बच्चे के लिए उस गड्ढे को जो ख़ास बनता था वो थे उसमें तैरते नन्हे टैडपोल | शैवालों ने उस गड्ढे की तली को मखमली हरी चादर से ढँक दिया था जिनके ऊपर मछलियों सरीखे वो टैडपोल तैरा करते थे | प्रकृति से मुझे बचपन से ही प्रेम रहा है शायद इसीलिए जो यादें मेरे दिलो दिमाग में बसी हुई है वो सबसे ज्यादा प्रकृति से ही सम्बंधित हैं | जब मैं उस घर के मेन गेट से बाहर निकलता हूँ तो बांयी तरफ नहीं जा सकता उधर का मुझे कुछ याद नहीं जब दायीं तरफ जाता हु तो कुछ दूर चलने पर मुझे जामुन के बड़े बड़े पेड़ दीखते हैं, वहा तीन तरह के जामुन के पेड़ थे काली, लाल, और पीली जामुन के पेड़ | हवा से लहराती जामुन के पेड़ों की पीली पीली पत्तियाँ, वो मुझे आज भी साफ़ साफ़ दिखाई देती हैं | 

दर्द या दवा

तू दर्द है, या दवा है ? मेरी तक़लीफ़ों की ख़ातिमियत है, या वज़ह है !!