हमारे पास समय बहुत कम था तो मैंने प्लान पर काम करना शुरू कर दिया | प्लानिंग करने में टेक्नोलॉजी ने मेरी बहुत मदद की, उस समय मेरे पास नोकिया ५८०० था और थे - सर्वज्ञानी गूगल बाबा | कुछ और चीजों की भी हमें जरूरत थी जैसे, एक बैग, दस्ताने, गॉगल्स, हेलमेट, एक बाइक और सबसे जरूरी चीज, कुछ पैसे | फण्ड की हमारे पास कमी थी ही, तो प्लान किया गया की अपने रूट को इस तरह से प्लान किया जाए जो हमारे दोस्तों और जाने वालो की घर से गुजरे ताकि एक तो कुछ पुराने लोगों से मुलाक़ात हो जाए और दूसरा ये की हमारे कही बहार रुकने का खर्चा बच सके | सुहैल का एक दोस्त खटीमा में रहता था और हमारे एक सीनियर बिजनोर में रहते थे | तो इनके आस पास की घुमने वाली जगहों को ध्यान में रखकर मैंने एक प्लान बना लिया |
ये गुजरता था लखनऊ से सीतापुर, खटीमा, पिथोरागढ़, वापस खटीमा, बिजनौर, हरिद्वार, ऋषिकेश, देहरादून, मसूरी फिर वहा से वापस बिजनौर फिर नैनीताल, और वहा से सीधे लखनऊ | नैनीताल के पास ही जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क है तो प्लान था की अगर समय मिला तो वहा भी होते चलेंगे | कुल मिला कर करीब १२-१५०० किमी० का प्लान था |
तो बस अब सब कुछ तैयार था तो ५ जुलाई को भोर में ४ बजे निकलने का समय तय हो गया | मैं ३ तारीख की रात को सरदार पटेल हॉस्टल, सुहैल के पास चला गया ताकि सुबह-सुबह समय पर निकला जा सके | उत्सुकता में रात में नीद तो आ नहीं आ रही थी पर मैं और सुहैल अपने "ड्रीम टूर" की बाते करते करते कब सो गए पता ही नहीं चला |
सुबह ४ बजे का आलार्म बजा तो हमारी नीद खुली .......सारा सामान तो पहले से ही पैक रखा था, हम बस नहाये धोये और चल दिए अपनी अपाचे बाइक लेकर | पहले हमने कॉलेज के अन्दर चाय पी, बाइक का ओडोमीटर शून्य पर किया ताकी हमें पता चल सके की पूरी यात्रा में हमने कितने किलोमीटर का सफ़र तय किया | फिर हम कालेज के पिछले गेट से खदरा होते हुए सीतापुर की ओर चल दिए, बाइक सोहेल चल रहा था और मई करीब १० किलो का बैग लेकर पीछे बैठा हुआ था |
जुलाई का महिना था और जब हम निकले तो बाहर बिलकुल अँधेरा था, पहला स्टॉप हमने सीतापुर पहुच कर ही लिया जो लखनऊ से करीब ८० किमि० दूर है|
जहाँ हम रुके वो एक ढाबे-नुमा चाय की दूकान थी या शायद चाय की दूकान-नुमा ढाबा था, पता नहीं, वहा काम करने वाले सुबह सुबह खाना बनाने का समान तैयार करने में लगे थे |
बाइक से उतरकर हमने अपनी कमर सीधी की और भोर की ठंडी हवा में एक लम्बी सांस ली, शहर से दूर प्रदूषण-रहित हवा में एक अलग ही खुशबू होती है| हमने एक एक कप चाय पी और फिर आगे निकल लिए | अभी तो हमने आधी दूरी भी तय नहीं की थी, लखनऊ से खटीमा की दूरी करीब २७० किमि० है | खैर हम चलते रहे रास्ते में कही-कही रुक कर चाय पी कुछ खाया पिया, नज़ारे देखे, एक चर्च में घूमे ...... और खटीमा की ओर चलते रहे ....अनजान जगहों पर अनजान लोगो से पता पूछते हुए... पर इसी बीच एक परेशानी आ खडी हुई... हमारी बाइक का स्टैंड टूट गया... बिना स्टैंड के चलने में तो कोई परेशानी नहीं थी पर जब भी बाइक खड़ी करनी होती बहोत परेशानी हो जाती थी.. अब वहाँ के लोकल मैकेनिक्स तो इसे ठीक नहीं कर पाते तो हमने TVS बाइक का एक शोरूम खोजा और जा कर अपनी बाइक ठीक करवाई... और फिर निकल पड़े खटीमा की ओर......
अंततः शाम को हम खटीमा पहुच गए.
सुहैल के दोस्त ने पहले ही हमारे लिए होटल देख रखा था | हमने होटल पहुच कर अपना सामान वहा रख दिया, अँधेरा होने में अभी थोडा समय था तो सोचा की थोडा खटीमा भी घूम लिया जाए| खटीमा उतराखंड में नेपाल की सीमा के पास शारदा नदी के किनारे बसा एक छोटा सा टाउन है| शहर में तो कुछ घूमने को था नहीं तो सोचा शारदा नदी पर ही घूम लिया जाए| रास्ते में पहले हम सागौन के बड़े बड़े पेड़ों के एक जंगल से गुज़रे, ये रास्ता टनकपुर को जाता था जहाँ पर खटीमा का पॉवर स्टेशन भी है | जंगलों के बाद हम एक थोड़ी खुली जगह पर पहुचे जहा से दूर पहाड़ों की एक श्रृंखला दिखाई दे रही थी | अदभुद ! दूर से दिख रहे उन पहाड़ों ने इस यात्रा को लेकर हमारे रोमांच को और भी बढ़ा दिया, आखिर उन पहाड़ों पर ही तो हमें जाना था | कुछ देर उस नज़ारे का आनंद उठाने के बाद हम आगे बढ़े और टनकपुर के पॉवर स्टेशन को देखते हुए शारदा नदी के किनारे पहुच गए | नदी का वो किनारा जहाँ पर हम थे बिलकुल नेपाल की सीमा से लगा हुआ है | नदी का वो नज़ारा बहुत ही खूबसूरत था, कुछ बच्चे वहा नदी में नहा रहे थे, वही नदी पर एक डैम भी बना हुआ है | सूरज डूबने वाला था तो हम कुछ तस्वीरे लेते हुए वापस हो लिए |

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| सागौन के पेड़ों का जंगल |
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| दूर दिखाई पड़ते पर्वत |
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| टनकपुर इलेक्ट्रिक पॉवर प्लांट |
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| सुहैल अपने मित्र के साथ |
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| नदी में नहाते लोग |
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| सूर्यास्त का सुन्दर नज़ारा |
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| वापसी के समय |
यात्रा अभी जारी है....अगले लेख में आगे का वृतांत |