विधाता ने मनुष्य की आयु 100 वर्ष तय की है , जिसमे से आधी रात्रि में चली जाती है, बची आधी में से आधी भी बाल्यावस्था और वृद्धावस्था में गुज़र जाती है और बाकी बचे 25 वर्षों में मनुष्य को रोग और वियोग के अनेक दुख झेलने पड़ते हैं और नौकरी चाकरी करनी पड़ती है। इसलिए हम कह सकते हैं कि जलतरंग के समान चंचल इस जीवन में लेश मात्र सुख भी नही है।
...भतृहरि